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लौट के हरक कांग्रेस में आए..पढ़े वरिष्ठ पत्रकार शास्त्री की कलम से….

दिनेश शास्त्री
देहरादून
पूरे पाँच दिन कांग्रेस की देहरी पर इंतज़ार के बाद शुक्रवार को बहू के साथ हरक सिंह रावत का घर में प्रवेश मिल गया। इतने बड़े नेता जिसे किंग मेकर के रूप में जाना जाता है, उसके साथ जब बेदर्दी से व्यवहार किया जाता है तो उसकी टीस को महसूस किया जा सकता है और यह टीस बहुत जल्द खत्म होने वाली हो सकती।
जिस हरक सिंह रावत के लिए पार्टियां पलक पाँवडे बिछाती रही, उसके साथ इस तरह के बर्ताव की बात कुछ अजीब सी लगती है।
दूसरी ओर देखिए भाजपा से ओम गोपाल रावत नाउम्मीद हुए तो सुबह कांग्रेस में शामिल हुए और पीछे से टिकट भी पक्का हो गया। वे नरेंद्र नगर में अब सुबोध उनियाल को चुनौती देंगे।
हालाँकि हरक सिंह और ओम गोपाल के मामले दोनों अलग अलग हैं और इन्हें एक पैमाने पर तोला भी नहीं जा सकता लेकिन जिस तरह से भाजपा को उखाड़ फेंकने के लिए हरक ने दिल्ली में डेरा डाला था, उससे तो एक बार तो लगा कि उनका ही तम्बू उखड रहा है और यहाँ तक खबरें आने लगी कि वे भाजपा में आने के लिए प्रयासरत हैं। हालाँकि यह सब कयासबाजी थी और शुक्रवार दोपहर बाद उन्हें कांग्रेस में प्रवेश मिल गया।
बताया जा रहा है कि हरक सिंह बिना शर्त कांग्रेस में लौटे हैं। अब वे भाजपा को हराने के लिए मैदान में उतरेंगे। कितना सफल होंगे, इसका पता 10 मार्च को लगेगा लेकिन जिस तरह से कांग्रेस ने उनकी सांसें अटकाये रखी, वह कभी न भूलने वाले अपमान के घूंट की तरह है और राजनीति में ये बातें लम्बे समय तक याद रखी जाती हैं। ठीक उसी तरह, जिस तरह 18 मार्च 2016 की घटना को हरदा याद रखे हुए थे।
कहां तो राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने कांग्रेस में शामिल होने की बात कह कर दिल्ली में डेरा डाला था और कहां फिर उन्हीं लोगों के सामने घर वापसी हुई जो देहरी से अंदर बढ़ने नहीं दे रहे थे।
राजनीति में कभी भी समीकरण स्थाई नहीं होते और न हर बार एक जैसे हालात ही रहते हैं। हरक सिंह रावत के इस ताज़ा प्रकरण से यह तो साबित हो ही गया है।
आगे क्या होगा, यह सवाल बेहद जटिल हैं। राजनीति और क्रिकेट दोनों को सम्भावनओ का खेल कहा जा सकता है। अंतर इतना होता है कि क्रिकेट भद्रलोक का खेल है और राजनीति कुटिलता की चासनी है। इसमें कौन कब क्या परोस ले, कुछ कहा नहीं जा सकता। अब हरक सिंह के सामने दोहरी चुनौती है। उन्हें अपना कद भी दिखाना है और बहू को मुकाम भी दिलाना है, जिसके लिए यह सारे पापड़ बेलने पड़े हैं। उनकी नजर लेंसडॉन सीट पर है। वह वहाँ से बहू को टिकट दिलाना चाहते हैं। कदाचित यह टिकट उन्हें मिल भी जाए लेकिन क्या अपने लिए टिकट नहीं चाहेगे? इसका पहला जवाब तो यह है कि अगर आप राजनीति में हैं तो टिकट के बिना नहीं रह सकते। लेकिन हाल के दिनों में इतना रायता फैल गया है कि क्रय शक्ति का इम्तिहान सा आ गया है। आज स्थिति यह हो गई है कि कभी दूसरों को टिकट दिलाने वाले आज खुद अपने लिए तरस रहे हैं।
आपको याद होगा 2012 में खंडूरी का रथ रोकने में हरक सिंह रावत की खास भूमिका रही थी। जानकार तो यह भी मानते हैं कोटद्वार से खंडूरी नहीं हारते। लेकिन ये अब बीती बात हो गई है। आज की बात करें तो कांग्रेस ने उन्हें बहुत लाचार किया है। हताश भी और निराश भी। यह याद रखने वाली बात है कि एक बड़े नेता को राजनीति कब किस मुकाम पर ला दे, इसे कोई नहीं जानता।
अब एक नजर उस स्थिति पर डालें, जब हरक सिंह को कांग्रेस में शामिल किया जा रहा था। वो विडीओ आपने भी देखा होगा। उम्मीद थी कि खुद राहुल गाँधी उनके गले में कांग्रेस का पटका डालेंगे। उनके समर्थक भी स्वाभाविक रूप से इसी उम्मीद में थे। लेकिन पटका हरदा ने डाला। इसके बहुत सारे निहितार्थ निकाले जा सकते हैं और इसके लिए हर कोई स्वतन्त्र है। पाँच दिन तक चले नाटकीय घटनाक्रम का पटाक्षेप इस अंदाज़ में होगा, कम से कम हरक सिंह जैसे नेता के लिए यह अपेक्षित नहीं था लेकिन राजनीति बड़ी बेदर्द होती है और उसका इन्तकाम भी उतना ही बेदर्द। देखना यह है कि अगले चार सप्ताह प्रदेश की राजीनीति में किस तरह गुजरते हैं। इन दिनों में बहुत कुछ नया देखने को मिलेगा। आप भी नजर बनाये रखें।

टीम यमुनोत्री Express

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