
जयप्रकाश बहुगुणा
बड़कोट/उत्तरकाशी
उत्त्तरकाशी के बड़कोट में कुछ ऐसे लोग हैं जो जानवरों के दर्द का अहसास कर न सिर्फ उनकी सेवा करते हैं बल्कि उन्हें अपनों सा प्यार भी देते हैं। ऐसे पशु प्रेमी जिले में भी हैं, जिन्हें घायल पड़े कुत्तों, बंदरों और गाय, सांड़ आदि का इलाज करने के लिए न तो किसी एनजीओ की मदद की दरकार है और न ही सरकार से किसी भी तरह के प्रमाणपत्र की आवश्यकता।
बड़कोट अस्पताल के आवासीय कालोनी में शौच पिट में एक बैल गिर गया था, जिसे बाहर निकालना नामुमकिन था फिर भी बैल को पिट से बाहर निकाल लिया गया।उसके लिए अस्पताल कर्मी,नगर सफाई कर्मी,जय हो ग्रुप, पुलिस, एसडीआरएफ, स्थानीय निवासियों के हौसलाअफजाई से बैल की जान बच गयी।वैसे
आवारा बेजुबान पशुओं से होने वाली परेशानी को बयां करने वाले तो तमाम मिल जाएंगे लेकिन
सड़क पर घायल पड़े किसी मवेशी(पशु) को देखकर रुकने वाले बहुत ही कम मिलेंगे। नगर पालिका बडकोट निवासी समाजसेवी सुनील थपलियाल (46) को रास्ते में कहीं पर भी कोई घायल पशु दिखता है तो उनके कदम स्वयं ठहर जाते हैं।वैसे पहले लॉक डाउन के समय 141 दिनों तक और दूसरे लॉक डाउन के दौरान 51 दिनों तक नगर पालिका के आवारा मवेशियों को जय हो ग्रुप के माध्यम से उन्होंने उनके भोजन की व्यवस्था की थी ।
सुनील बताते हैं कि वे घायल आवारा कुत्तों ,गाय की सेवा कर रहे हैं। कभी बच्चे तो कभी बड़े बुजुर्ग उन्हें किसी घायल कुत्ते,गाय बैल की जानकारी देते हैं तो वे तत्काल वहां पहुंचकर उस बेजुबान का इलाज पशुपालन विभाग की मदद से शुरू कर देते हैं। बेजुबान जानवर के जख्मों पर न सिर्फ दवा और पट्टी ही करवाते हैं बल्कि जब तक वह आवारा पशु चलने के लायक नहीं हो जाता, उसके लिए चारा और रोटी का इंतजाम भी करते हैं। अब तक वे 20 से अधिक कुत्तों व कई मवेशियों का इलाज कर उन्हें ठीक करवा चुके हैं।
मवेशियों की तकलीफ सुनकर दौड़ पड़ते हैं उन्हें जहां भी किसी गाय अथवा सांड़ के घायल होने की सूचना मिलती है तो वहां खड़े नजर आते हैं। उन्होंने बताया कि अक्सर घायल मवेशियों को देख लोग उन्हें हांक कर स्वयं से दूर करने का प्रयास करते हैं लेकिन उनका मन ऐसे दृश्यों को देखकर और भी विचलित हो जाता है। बेजुबान जानवरों की जितनी हो सके सेवा ही की जानी चाहिए।

