नौगांव/ अरविन्द थपलियाल। महाशिवरात्रि का महापर्व शुक्रवार 8मार्च को है और महाशिवरात्रि का महापर्व विशेष महत्व के साथ शुभलग्न पर होगा। विकासखंड नौगांव के पौराणिक शिव मंदिर दारसौं में महाशिवरात्रि का महापर्व धूमधाम से मनाया जायेगा और इसी दिन श्रीमद्भागवत कथा का भी शुभारम्भ बाल व्यास कपिल उनियाल के सानिध्य में होगा। बतादें कि तहसील बड़कोट के मुंगरसन्ति क्षेत्र के ग्राम पंचायत दारसौं में शिव मंदिर सैकड़ों वर्ष पुराना जिसकी अखंडता और प्राचीनता उल्लेखनीय है।
शिव मंदिर दारसौं सैकड़ों वर्ष पुराना है और मंदिर के अंदर विशाल शिवालय है जिसका अभीतक कोई लिखित प्रमाण नहीं है कि यह मंदिर कब बना होगा और किसने बनाया होगा इसका अभितक कोई लिखित प्रमाण किसी के पास नहीं है।
दारसौं निवासी वयोवृद्ध तोताराम नौटियाल और कफनौल निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक अतर सिंह पंवार बतातें हैं कि पूर्वजों की एक कहावत है कि कफनौल से एक गाय कफनौल से लगातार दारसौं आती थी और जहां शिव मंदिर है वहां दूध डालती है लेकिन कोई देखता नही था लेकिन जब एक दिन पूर्वजों ने निकरानी की तो विशाल झाड़ी के अंदर गाय गई और दूध डालकर गयी तब लोगों ने वहां झाड़ियों को काटा तो मालूम हुआ कि वहां अद्वभूत एक मंदिर है।
आज दारसौं शिव मंदिर शिव नगरी से जाना जाता है और यह प्राचीन मंदिर आदि गुरु शंकराचार्य से निर्मित है, मालूम हो कि यहां कि प्राचीनता महत्व बहुत पवित्र है यहां नि: संतान दंपतियां संतान गोपाल का पाठ मंदिर में करती है और फल की प्राप्ति होती है।
मुंगरसन्ति क्षेत्र के आराध्य देव धयेश्वर नाग को इस मंदिर में बांयी दिशा में एक पग जगह दी गयी और महाराज धयेश्वर नाग को शिव शक्ति के रूप में क्षेत्र में पुजा जाता है।
शिव मंदिर दारसौं महाशिवरात्रि के पर्व पर प्रत्येक वर्ष शिव जलाभिषेक होता और श्रद्धालु रात्रि जागरण करतें हैं।
यह शिव मंदिर कफनौल, थोलिंका,गैर, हिमरोल, सिमलसारी, गन्ना हैं जिनका आरध्य देव धयेश्वर नाग है और शिव मंदिर दारसौं में इनकी अपार आस्था है।
शिव मंदिर दारसौं को लेकर जानकार यह बतातें हैं कि पांडवों को जब वनवास हुआ था तो लाखामंडल से पांडव इसी रास्ते गये थे और इसके यह साक्ष्य दारसौं के प्राचीन शिव मंदिर के रूप में जीता जागता उदाहरण है।
सबसे बड़ी बात यह है कि दारसौं गांव की इस शिव नगरी में सैकड़ों वर्षों सेशराब पर पूर्ण प्रतिबंध है यहां बाजगी भी शराब नही पीता और जिसने शराब पी वह पागल या अपाईज हुआ है और यह परंपरा आज भी जिंदा है।

