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राजनीति में तंत्र मंत्र कितने उपयोगी?,सच्चाई है तो एक्स सी.एम. पर वन्य जीव संरक्षण का हो मुकदमा दर्ज

दिनेश शास्त्री
रानीति का तंत्र मंत्र से शायद पुराना नाता है। विज्ञान के इस युग में भी आजकल लोग इस कदर तंत्र मंत्र के मायाजाल में उलझ चुके हैं कि लगता नहीं कि उन्हें खुद पर भरोसा नहीं है।
पूर्व सीएम हरीश रावत के अतीत में खासुलखास रहे रणजीत सिंह रावत ने हाल में जिस तरह का खुलासा हरदा के बारे में किया, वह चौंकाने वाला तो नहीं लेकिन राजनीति में सक्रिय लोगों की खुद से ज्यादा तंत्र मंत्र पर आसक्ति को विमर्श के केंद्र में ला दिया है।रणजीत रावत वर्ष 2016 का किस्सा याद दिलाते हैं कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के दौरान उनके नेता टोने टोटके के चलते अपने गले में तेरह मालाएं और हर जेब में अलग अलग रंग के कपड़े रखते थे। यही नहीं तांत्रिकों के चक्कर मे पड़कर बंदर और सुअर कटवाते थे और श्मशान घाट में जाकर शराब से नहाते थे।
वैसे राजनीति में माना जाता है कि संबंधों में कटुता आ भी जाए तो इतनी गुंजाइश रखी जाती है कि कल अगर फिर एक होना पड़े तो पूर्व के कथनों पर शर्मिंदगी न हो लेकिन रणजीत रावत के हालिया बयान ने एक तरह से भविष्य के लिए तमाम रास्ते बंद से कर दिए हैं। बहरहाल यह उनका निजी मामला है, लेकिन इस बीच उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी ने इस मामले में अपनी तीखी प्रतिक्रिया दर्ज करते हुए इसे विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास किया है। उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी ने रणजीत रावत द्वारा हरदा पर लगाए आरोपों की प्रकृति को बहुत गंभीर बताते हुए कहा है कि सरकार को निष्पक्ष एजेंसी द्वारा इसकी जांच करनी चाहिए। श्री तिवारी का कहना है कि सोशल मीडिया पर हरीश रावत के खासमखास रहे सहयोगी के उनके आपसी संबंधों एवं पार्टी से जुड़े प्रसंग पर कुछ नहीं कहना चाहते। लेकिन उस मामले में तंत्र मंत्र में वन्यजीवों की बलि एवं शराब के अनुष्ठान से जुड़े हुए प्रसंग निश्चय ही गंभीर प्रकृति हैं, जो एक सरकार के मुख्यमंत्री से जुड़े होने के नाते उत्तराखंडी जन जीवन के प्रति अच्छी धारणा पैदा नहीं करते।लिहाजा वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 में इस तरह के मामले को गंभीर अपराध घोषित किया गया है और तमाम लोग इन मामलों में न्यायालयों में मुकदमों का सामना कर रहे हैं। यदि इन बयानों में सच्चाई है तो इस मामले में शामिल रहे लोगों के ख़िलाफ़ वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत कानून सम्मत कार्यवाही की जानी चाहिए।
जाहिर है यह महज शुरुआत है। इस मामले के अगले कुछ दिनों में लंबा खिंचने की आशंका लग रही है। वैसे चुनाव आते रहेंगे, हार जीत भी होती रहेगी, लेकिन जिस तरह से राजनीति का स्तर सामने आ रहा है, उससे काफी कुछ भविष्य के परिदृश्य की बानगी तो दिखती ही है। यकीन मानिए आने वाले समय में राजनीति में इस तरह के मुद्दे भी हावी हो सकते हैं, आम आदमी को अपने मुद्दों की चिंता शायद खुद ही करनी पड़े।

टीम यमुनोत्री Express

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