देहरादून। श्री सनातन धर्म मंदिर, नेहरू कॉलोनी, देहरादून में श्रावण मास के पावन अवसर पर आयोजित श्री शिवमहापुराण कथा के चतुर्थ दिवस में कथा व्यासपीठासीन पूज्य श्री पवन देव चतुर्वेदी जी महाराज (श्री धाम वृन्दावन) ने भगवान शिव एवं राजा दक्ष के प्रसंग का अत्यंत मार्मिक एवं भावपूर्ण वर्णन किया।
महाराज श्री ने बताया कि अहंकार मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण है। राजा दक्ष ने अपने अहंकार के कारण भगवान शिव का अपमान किया और यज्ञ में उन्हें आमंत्रित नहीं किया। पिता के यज्ञ में पहुँची माता सती ने जब भगवान शिव का निरादर देखा तो धर्म एवं पति के सम्मान की रक्षा हेतु योगाग्नि में अपने शरीर का त्याग कर दिया।
इस करुण प्रसंग को सुनकर कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं की आँखें नम हो गईं। महाराज श्री ने आगे बताया कि माता सती के देहत्याग का समाचार मिलने पर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हुए और अपनी जटा से वीरभद्र एवं भद्रकाली को प्रकट कर दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कराया। वीरभद्र ने यज्ञ में उपस्थित देवताओं एवं यज्ञ समर्थकों को उनके कर्मानुसार दंड दिया तथा राजा दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया। बाद में भगवान शिव की करुणा से दक्ष को बकरे का सिर लगाकर पुनः जीवन प्रदान किया गया, जिससे क्षमा, करुणा और धर्म की महान शिक्षा प्राप्त होती है।
कथा के दौरान महाराज श्री ने इक्यावन शक्तिपीठों की उत्पत्ति का भी विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने बताया कि भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा हेतु सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंगों का विभाजन किया और जहाँ-जहाँ माता के अंग, आभूषण एवं वस्त्र गिरे, वहाँ-वहाँ दिव्य शक्तिपीठों की स्थापना हुई, जो आज भी श्रद्धा, भक्ति और शक्ति के महान केंद्र हैं।
कथा के अंत में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भगवान शिव एवं आदिशक्ति जगदम्बा के जयघोष के साथ धर्म, भक्ति और सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। कथा उपरांत आरती एवं प्रसाद वितरण किया गया।

