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सुदि त क्वी नि बोल्दू कै सणि……पूर्व सीएम ने की उत्तराखंड में दलित मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा जाहिर 

 

सुदि त क्वी नि बोल्दू कै सणि……। 

पूर्व सीएम ने की उत्तराखंड में दलित मुख्यमंत्री देखने की इच्छा जाहिर 

दिनेश शास्त्री 
देहरादून।
कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व सीएम हरीश रावत ने अपने जीते जी उत्तराखण्ड में दलित मुख्यमंत्री देखने की इच्छा जाहिर कर राजनीति के तालाब में न सिर्फ हलचल मचा दी बल्कि कई सवाल भी उठा दिए हैं। पंजाब में दलित मुख्यमंत्री की ताजपोशी कराने के बाद उमड़ा भावनाओं का यह ज्वार कितना कारगर होगा, यह तो समय बताएगा लेकिन हरदा ने खुद अपने पर भी सवाल खड़ा किया है। पूछा जा सकता है कि यदि आप इतने महान विचारों को धारण करते हैं तो 2014 में क्यों नहीं किसी दलित को यह पद नहीं दिलाया, तब क्यों खुद उस पद पर आसीन हो गए, जबकि उस समय आपके पास यशपाल आर्य जैसा भद्र चेहरा भी था, जबकि आज आपकी टीम में उस दर्जे का नेता फिलहाल तो दिख नहीं रहा है। पुरोला के राजकुमार भाग चुके हैं। ममता राकेश, देहरादून के राजकुमार, दूसरी पंक्ति में फिलहाल डॉ. जीतराम औऱ श्रीमती सरिता आर्य ही दिखते हैं, तो क्या उन पर दांव लगाएंगे?
एक सवाल यह भी हो सकता है कि क्या पंजाब में हुई किरकिरी के बाद पार्टी आलाकमान का भरोसा कम हो गया है? राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं पर भरोसा करें तो कांग्रेस नेतृत्व नए प्रयोग करने को आतुर है, तभी अपने जीते जी दलित मुख्यमंत्री की बात उभरी है। वैसे जब पांच राज्यों के चुनाव सिर पर हैं और पार्टी आलाकमान हिमाचल प्रदेश में छुट्टी मनाने गया है। हालांकि यह आम लोगों का सोचना है। नेतृत्व तो वहां भी मंथन ही कर रहा होगा। खासकर जो चिंतन दिल्ली में नहीं हो सकता। दिल्ली में तो दिनभर नेता व्यस्त रखते हैं। इसलिए हिमाचल में सुबह दोपहर शाम पार्टी के भविष्य के बारे में सोचने का समय निकाल लिया जा सकता है । खैर बात हरदा की इच्छा की हो रही है तो लाख टके की बात यह है कि वे पार्टी नेतृत्व को इस बात के लिए तैयार करें और चुनाव से पूर्व पार्टी का दलित चेहरा घोषित करवा सकते हैं। लेकिन जानकार मानते हैं कि यह इच्छा किसी बड़ी चोट की वजह से उपजी होगी, वरना जहाँ खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए पंजाब के दायित्व से मुक्त करने की मांग इसलिए की जा रही थी कि उत्तराखंड को समय देना है तो क्या वो मुराद पूरी होने में संदेह है? इसी कारण मायूसी में दलित कार्ड फेंका गया? बातें बहुत सारी हैं और अगर आप राजनीति में है तो या तो किंगमेकर होते है या फिर किंग बनने की अभिलाषा ही होती है। देखना यह है कि किंग और किंगमेकर बनने में से दिसम्बर तक कौन सा विकल्प अपनाया जाता है। दिसम्बर भी ज्यादा दूर नहीं है। आप भी नजर बनाए रखिये। आने वाला घटनाक्रम निसन्देह रोचक। होने वाला है। बस इन्तज़ार कीजिये।
टीम यमुनोत्री एक्सप्रेस

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