उत्तरकाशी से सुनील थपलियाल।
स्वास्थ्य विभाग की घोर लापरवाही का एक मामला सामने आया है प्रभारी मंत्री गणेश जोशी के हस्तक्षेप के बाद एक प्रसव पीड़ा से पीड़ित महिला की जान बच पाई, भले ही प्रसव के बाद बच्चे को नहीं बचाया जा सका लेकिन महिला सुरक्षित है। यदि स्वास्थ्य विभाग महिला को बेवजह रेफर पर रेफर न करता तो शायद उस शिशु को भी बचाया जा सकता था।
मालूम हो कि यमुना घाटी के ढालिया गांव निवासी श्रीमती किरन पत्नी यशपाल को पहले
मालूम हो कि यमुना घाटी के ढालिया गांव निवासी श्रीमती किरन पत्नी यशपाल को पहले
CHC बड़कोट लाये जहाँ से रेफर कर CHC नौगाँव और वहां से रेफर कर उत्तरकाशी जिला अस्पताल भेजा गया, जहां पर उसकी हालत बिगड़ती देख उत्तरकाशी जिला महिला अस्पताल ने भी देहरादून के लिए रेफर कर दिया। परिजनों ने तड़के सुबह 5:49 बजे जैसे ही प्रभारी मंत्री गणेश जोशी को इस मामले की जानकारी दी, वैसे ही उन्होंने जिलाधिकारी उत्तरकाशी को फोन किया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया, इस पर काबीना मंत्री ने अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी को इस मामले को देखने के निर्देश दिए। शासन के हस्तक्षेप के बाद जिलाधिकारी ने आधे रास्ते से प्रसव पीढ़ा से पीड़ित महिला को वापस बुलाया और जिला अस्पताल में उसका प्रसव करवाया। डॉक्टर ने महिला की जान तो बचा ली, लेकिन बच्चे को नहीं बचाया जा सका, अगर उक्त महिला को समय से उपचार नही मिलता तो उसे भी बचा पाना असम्भव था। प्रभारी मंत्री के हस्तक्षेप और महिला की जान बचाने पर आम जनमानस के बीच में बड़ी चर्चा है और ग्रामीणों ने प्रभारी मंत्री का आभार जताते हुए धन्यवाद किया। साथ ही जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तरकाशी के अस्पताल महज रेपर सेंटर बनकर रह गए हैं। उन्होंने उत्तराखंड सरकार से बीमार पड़े इन अस्पतालों को स्वस्थ करने की मांग की है। समाजसेवी व बीजेपी नेेता किशन लाल ने पत्रकारों को जानकारी देते हुए बताया कि ग्रामसभा पौंटी के ग्राम ढालिया गांव निवासी किरण पत्नी यशपाल के प्रसव मामले प्रभारी मंत्री जी का हस्तक्षेप करने के बाद उपचार होना और महिला को सुरक्षित बचाना गरीब परिवार के लिए बड़ी बात है। उन्होंने प्रभारी मंत्री श्री गणेश जोशी का आभार जताया। उन्होंने कहा कि सुबह प्रभारी मंत्री जी को फोन कर जानकारी दी गयी और उन्होंने तत्काल जिलाधिकारी को फोन किया उन्होंने नही उठाया तो अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी को उक्त महिला के उपचार के लिए कहा , कुछ देर बाद जिलाधिकारी का फोन वापस मुझे आया, मेरा फोन नंबर भी मंत्री जी ने दिया होगा। अगर समय से उक्त महिला को उपचार न मिलता तो उसे बचा पाना असंभव था।
इस प्रकरण के बाद कुछ ऐसे बुनियादी सवाल भी उठ खड़े हुए हैं, जिनके जवाब जरूरी हैं, पहला यह कि बड़कोट, नौगाँव जैसी जगह पर जो स्वास्थ्यकर्मी तैनात हैं, वे क्या वेतनभोगी हैं, जनता के स्वास्थ्य के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है? या वे इतने योग्य नहीं हैं कि किसी महिला का सुरक्षित प्रसव करा सकें? यदि ऐसा है तो विभाग को देखना होगा और सुदूर क्षेत्रों में योग्य लोगों को तैनात कर अयोग्य कार्मिकों को सेवामुक्त करना चाहिए। दूसरे प्रभारी मंत्री का फोन डीएम नहीं उठाएगा तो क्या हर बार अपर मुख्य सचिव को ही बीच में लाना होगा? यानी लोकतंत्रिक व्यवस्था में प्रभारी मंत्री की अफसरों की नजर में कोई अहमियत नहीं है? क्या वे सिर्फ अपर मुख्य सचिव का आदेश ही मानेंगे? तीसरी बात जब उत्तरकाशी जिला अस्पताल में प्रसव हो सकता था, जो हुआ भी, तो क्यों उस प्रसव पीड़ित महिला को देहरादून रेफर किया गया? यह सिर्फ उत्तरकाशी का मामला नहीं है, पूरे पहाड़ की यही दशा है। गढ़वाल में देहरादून और कुमाऊं में हल्द्वानी रेफर करने का रिवाज ही स्वास्थ्य विभाग में नौकरी का अर्थ रह गया है। जाहिर है कि यदि किरण नाम की उक्त महिला को अनावश्यक देहरादून नहीं भेजा जाता तो शायद उसके शिशु की मौत नहीं होती। नौकरी तो सरकारी चाहिए लेकिन काम नहीं करेंगे की नीति ने पहाड़ का बेहद अहित किया है। इस स्थिति के लिए पहाड़ की महिलाओं ने अलग राज्य की लड़ाई तो नहीं लड़ी थी। सुन रहे हो सरकार। अभी भी वक्त है, सिस्टम सुधारने का।
टीम यमुनोत्री Express

