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बात निकली है तो बहुत दूर तक जाएगी,आखिर क्यों बेचैन हैं गणेश गोदियाल

 

 

दिनेश शास्त्री
देहरादून

श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के बहाने पूर्व अध्यक्ष गणेश गोदियाल न सिर्फ चर्चा में हैं बल्कि इस बहाने एक बड़ा विमर्श का विषय भी बन गया है।
आपको याद होगा, अभी दो दिन पहले गणेश गोदियाल ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मिल कर खुद पर लगे आरोपों की हाईकोर्ट की न्यायाधीश से करवाने की मांग की। हालांकि साथ ही उन्होंने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी धनसिंह रावत के क्रियाकलापों की जांच कराने की मांग भी कर डाली और ऐसा न होने पर सीएम आवास पर धरना देने की बात कही है। धनसिंह का मामला अपनी जगह पर है, उस पर अलग से चर्चा की जा सकती है। यहां बात सिर्फ मंदिर कमेटी की है।
आरोप है कि गोदियाल ने अध्यक्ष पद पर रहते अपनी सीमाओं से बाहर किसी मंदिर का जीर्णोद्धार कराया अथवा प्रतापनगर में कोई सड़क बनवा दी। यह आरोप हम नहीं लगा रहे हैं, यह सब पिछले काफी समय से सार्वजनिक तौर पर लोगों के सामने हैं। सीधे तौर पर कहें तो मंदिर समिति के ही एक सदस्य ने लगाए, जिनकी वजह से गोदियाल की बैचैनी बढ़ी हुई है। याद रहे गोदियाल 2012 से 2017 तक मंदिर समिति के अध्यक्ष रहे हैं।
अब सवाल यह है कि मंदिर समिति का सिस्टम कैसे अध्यक्ष के आदेशों पर अमल करते समय कायदे कानून का ध्यान नहीं रख पाया। 1939 के एक्ट के तहत श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति सरकार के नियंत्रण में है। सरकार के सारे कामकाज नियम कायदे के तहत होते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि मंदिर समिति में सरकार द्वारा तैनात कार्यपालक अधिकारी इस कदर अक्षम थे कि वे समिति के अध्यक्ष के आदेश के क्रियान्वयन में कायदे नहीं बता पाए। हम लगातार देखते आ रहे हैं कि शासन में बैठे अधिकारी मंत्री के निर्णय अथवा आदेश के क्रियान्वयन में भविष्य में आने वाली कठिनाई बता कर हाथ खड़े कर देते हैं। कई बार देखने में आता है कि मंत्री के आदेश के बावजूद विभागीय सचिव विधि विभाग की राय लिए बिना कोई निर्णय लेने से बचते हैं, यही कारण है कि शासन में लम्बे समय तक फाइल घूमती रहती हैं। तो क्या मंदिर समिति के कार्यपालक अधिकारी का इस ओर ध्यान नहीं गया, या उन्हें जोखिम लेने में आनंद आता है अथवा समझ का अभाव है। कुछ भी हो लेकिन अब अगर मामले की जांच हुई तो कार्यपालक अधिकारी से कैफियत तो पूछी ही जायेगी और पूछी भी जानी चाहिए। आखिर सरकार ठोक बजा कर अधिकारियों का चयन करती है। दूसरे मंदिर समिति खाला जी का घर तो है नहीं, जो मर्जी हो करते जाओ। अगर ऐसा है तो फिर कार्यपालक अधिकारी की जरूरत क्या है। निष्कर्ष यह कि कार्यपालक अधिकारी का दायित्व होता है कि वह राजनीतिक निर्णय को दुरुस्त कर लक्ष्मण रेखा का आभास कराए। देखना यह है कि कब गोदियाल धरने पर बैठते हैं, और कब सरकार जांच शुरू करती है या नहीं। बात तो जीरो टॉलरेंस की आप भी सुनते ही आ रहे हैं। लगे हाथ गोदियाल के आरोपों की जांच भी हो जाए तो हर्ज भी क्या है? आखिर सभी का मकसद दूध का दूध और पानी का पानी होना ही चाहिए।

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