उत्तरकाशी/सुरेश चंद रमोला ।विश्व प्रसिद्ध पवित्र बौखटिब्बा बौख नागराजा मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित प्राकृतिक सुंदरता, विविधता और बेहद खूबसूरत छटाओं को समेटे बुग्यालों से आच्छादित रुपनौलसौड पर्यटक स्थल आगामी चार सितंबर कृष्ण जन्माष्टमी के दिन मक्खन की होली से गुलजार होगा।
गंगा और यमुना घाटी के वासिंदों का मखमली घास का यह मैदान आपसी भाईचारे और प्रेम स्नेह का संगम स्थल है। कृष्ण जन्माष्टमी के दिन दोनों घाटियों के ग्रामीण बड़ी तादाद में रुपनौलसौड में एकत्रित होंगे और अनूठे पारंपरिक लोक परंपराओं के साथ दूध, ताजे मक्खन और छांछ की होली खेलेंगे। गंगा घाटी के दशगी और भंडारस्यूं तथा यमुना घाटी के मुंगरसंती और बड़कोट पट्टियों से बड़ी तादाद मैं ग्रामीण छै हजार फीट के ऊंचाई वाले इस स्थान पर इक्कठे होकर इस अनूठे पारंपरिक उत्सव को मनायेंगे। मान्यता है कि इस त्योहार को मवैसियों के प्रति आभार के लिए मनाया जाता है जिसमें पहाड़ी लोकनृत्य और लोक गीतों का आयोजन भी होता है।
खूबसूरत बुग्यालों से दिखते हैं मनमोहक दृश्य।
इन बेहद खूबसूरत बुग्यालों से मंसूरी, देहरादून नैनबाग, विकासनगर के अलावा गंगा और यमुना घाटी के मनमोहक दृश्य भी दिखाई देतै है। रुपनौलसौड एक गोल्फ मैदान जैसा स्थल है जहां लोक संस्कृति और पौराणिक मान्यताओं में पूजनीय अलौकिक और रहस्यमयी देवियां आच्छरी मातृयां अठखेलियां खेलती है। ये परियां प्रकृति की रक्षक और दिव्य शक्तियों का प्रतीक है जो ऊंचे मखमली बुग्यालों और घने जंगलों में अदृश्य निवास करती है।
मखमली घास और रंग-बिरंगे फूलों की छटा संजोया रुपनौल
रुपनौल सौंड का बुग्याल यानि अल्पाइन घास एक टिब्बै मैं फैला है और इसके इसके चारों तरफ घने जंगल आच्छादित है। गर्मियों में यहां मखमली घास और रंग बिरंगे फूल खिलते हैं जबकि सर्दियों में यह वर्फ की सफेद चादर से ढका रहता है। स्थानीय लोग इस मैदान का उपयोग पशु चारागाह के लिए करते है और इसके अलावा ट्रेकिंग और कैंपिंग के लिए भी इस रमणिक स्थल प्रसिद्ध है। राडी टाप से कपनोल कै पास मुराल्टु तथा मंजगांव व कबाटा से इस स्थान के पंहुचने के पैदल ट्रेक बने हैं।

